हिमालय पर्वत की उत्पत्ति कैसे हुई?

हिमालय पर्वत की उत्पत्ति तृतीय महाकल्प (Tertiary Era) के दौरान हुई परन्तु इसमें कैम्ब्रियन से लेकर आदिनूतन युग (Cambrian to Eocene) तक के शैल पाये जाते हैं।

महाद्वीपीय विस्थापन के सिद्धांत के अनुसार लारेशिया व गोंडवाना महाखण्ड के मध्य टेथिस महासागर निर्मित हुआ। टेथिस सागर में जमे स्तरित अवसादों पर संपीडन बलों के कारण वलनीकरण ओर भ्रंशन प्रक्रियाओं के फलस्वरूप हिमालय पर्वतमाला की उत्पत्ति हुई। हिमालय पर्वत की सर्वाधिक ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई औसत समुद्र तल से 8848 मीटर है और यह विवर्तनिक हलचलों के कारण बढ़ रही है। हिमालय की आयु कालगणना के अनुसार 45 करोड़ वर्ष आंकी गई हैं और इस की वर्तमान ऊंचाई की स्थिति 5.5 करोड़ वर्ष पूर्व अर्जित की गई थी।

हिमालय के एक ओर दक्षिण में डेकन के पठार तथा दूसरी ओर उत्तर में तिब्बत के पठार के रूप में दृढ़ भूमियां है। इनके बीच में टेथिस सागर पूर्व काल में रहा था जिसमें लगातार अवसादों का निक्षेपण हुआ। इन दोनों दृढ़ भूमियों से टेथिस सागर पर दाब की क्रियाशीलता के फलस्वरूप अवसादों के वलित होने से हिमालय पर्वत की उत्पत्ति हुई। मध्यपुराजीवी महाकल्प (Middle Palaeozoic Era) के दौरान उत्तर में लारेशिया व दक्षिण में गोंडवाणा महाद्वीपों के मध्य, पूर्व से पश्चिम तक विस्तरित संकरे समुद्र टेथिस (Tethys) में महाद्वीपों से अपरदित अवसादों का निक्षेपण करोड़ों वर्षों तक होता गया। जुरैसिक काल के उत्तरार्द्ध में लगभग (18 करोड़ वर्ष पूर्व) गोंडवाना महाद्वीप का विघटन तथा विस्थापन होने के कारण सम्पीड़न बलों की उत्पत्ति हुई। लारेशिया महाद्वीप का भी विस्थापन हुआ। इस कारण टेथिस सागर में निक्षेपित स्तरित अवसादों पर सम्पीड़न बल के प्रयोग से वलन, क्षेपण तथा भ्रंशन के फलस्वरूप हिमालय पर्वत की उत्पत्ति हुई। अतः महाद्वीपों के विस्थापन को हिमालय की उत्पत्ति का मुख्य कारण माना जा सकता है। हिमालय पर्वत की शैलों में उपलब्ध जीवाश्मीय प्रमाण संकेत करते है कि इनका निर्माण उथले सागरों में ही हुआ जिन्हें भू-अभिनति (Geosyncline) कहते हैं। प्रायद्वीपीय भारत का मध्य एशिया की ओर अधःक्षेप (Under Thrust) होने के फलस्वरूप टेथिस सागर के अवसादों का उत्थापन हुआ और हिमालय पर्वत की उत्पत्ति हुई।

हिमालय पर्वत माला का उत्थान (Upliftment) चार विभिन्न कालों में हुआ। उत्तर आदिनूतन काल (Late Eocene) (लगभग 6 करोड़ वर्ष पूर्व) में प्रथम भू-संचलन के कारण मध्य हिमालय भाग ऊपर उठा तथा इसके उत्तर व दक्षिण भाग में अवशिष्ट टेथिस सागर में निक्षेपित होते रहे। दूसरा तीव्रतम भू-संचलन मध्य नूतन युग (Miocene) (2 करोड़ वर्ष पूर्व) में हुआ तथा इसके कारण उत्तरी भाग की पर्वत-श्रेणियों में उत्थान हुआ। इस प्रभावशाली तीव्र आवेग के कारण दक्षिण के कुछ स्थानों को छोड़कर अधिकांशः टेथिस का लोप हो गया था। दक्षिण के गिरीपद क्षेत्र के संकरे व लम्बे समुद्री भाग में शिवालिक अवसादों का निक्षेपण होता रहा। तीसरा भू-संचलन अतिनूतन युग (Pliocene) (1 करोड़ वर्ष पूर्व) के दौरान हुआ जिसके कारण सम्पूर्ण टेथिस सागर विलुप्त हो गया तथा शिवालिक पर्वत श्रेणी का उत्थान हुआ। इसी आवेग के कारण हिमालय की ऊंचाई में ओर उत्तरोत्तर वृद्धि हुई । चौथा तथा अंतिम भू-संचलन अत्यन्त नूतन युग (Pleistocene) (25 लाख वर्ष पूर्व) में हुआ जिसके फलस्वरूप हिमालय पर्वत विश्व की सर्वोच्च चोटी बन गई तथा भारतीय प्लेट के संचलन के कारण इसकी ऊंचाई में वर्तमान में भी लगातार शनै-शनै वृद्धि होती जा रही है।