वायु प्रदूषण (Air pollution)

जब वायुमंडल में एक या अधिक प्रदूषकों की मात्रा इतनी अधिक हो जाए जिससे कि वायु की गुणवत्ता में ह्रास हो जाए तथा यह जैव समुदाय के लिये हानिकारक हो, तो इसे वायु प्रदूषण (Air pollution) कहते हैं।”

वायु प्रदूषकों के प्रकार

प्राथमिक प्रदूषक (Primary Pollutants)

ये प्रदूषक प्राकृतिक अथवा मानवीय क्रियाकलापों के द्वारा सीधे वायु में निष्कासित होते हैं। इनके उदाहरण हैं: ईंधन जलाने से निकलने वाली सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, विविध हाइड्रोकार्बन तथा कणिकाएँ।

द्वितीयक प्रदूषक (Secondary Pollutants)

सूर्य के विद्युतचुंबकीय विकिरणों के प्रभाव के अधीन प्राथमिक प्रदूषकों तथा सामान्य वायुमंडलीय यौगिकों के बीच रासायनिक अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप द्वितीयक प्रदूषक का निर्माण होता है। उदाहरण के लिये, प्राथमिक प्रदूषक सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) वायुमंडल की ऑक्सीजन के साथ अभिक्रिया करके सल्फर ट्राइऑक्साइड (3) बनाती है, जो एक द्वितीयक प्रदूषक है। सल्फर ट्राइऑक्साइड जलवाष्प से मिलकर एक और द्वितीयक प्रदूषक सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) बनाता है जो कि अम्ल वर्षा का घटक है। NO2, के दो अन्य द्वितीयक प्रदूषक परॉक्सीएसिटिल नाइट्रेट (PAN) तथा नाइट्रिक अम्ल (HNO3) हैं। धूम कोहरा (SMOG) धुएँ और कोहरे का मिश्रण होता है।

वायु प्रदूषक तालिका

प्रदूषकस्रोतस्वास्थ्य प्रभाववायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) सीमाएँ
पार्टिकुलेट मैटर (PM)वाहन, बिजली संयंत्र, औद्योगिक प्रक्रियाएं, जंगल की आग, धूलश्वसन संबंधी समस्याएं (अस्थमा, ब्रोंकाइटिस), फेफड़ों को नुकसान, हृदय रोग, कैंसरPM2.5: 0-50 (अच्छा), 51-100 (संतोषजनक), 101-150 (संवेदनशील समूहों के लिए अस्वस्थ), 151-200 (अस्वस्थ), 201-300 (बहुत अस्वस्थ), 301-400 (खतरनाक), 401+ (आपातकालीन)
ओजोन (O3)वाहन, बिजली संयंत्र, औद्योगिक प्रक्रियाएंश्वसन संबंधी समस्याएं (सीने में जकड़न, खांसी), फेफड़ों को नुकसान0-50 (अच्छा), 51-100 (मध्यम), 101-150 (संवेदनशील समूहों के लिए अस्वस्थ), 151-200 (अस्वस्थ)
नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2)वाहन, बिजली संयंत्र, औद्योगिक प्रक्रियाएंश्वसन संबंधी समस्याएं (श्वास कष्ट, सीने में दर्द), फेफड़ों को नुकसान0-50 (अच्छा), 51-100 (मध्यम), 101-150 (संवेदनशील समूहों के लिए संवेदनशील), 151-200 (अस्वस्थ)
सल्फर डाइऑक्साइड (SO2)बिजली संयंत्र, औद्योगिक प्रक्रियाएं, ज्वालामुखी विस्फोटश्वसन संबंधी समस्याएं (खांसी, घरघराहट), आंखों में जलन, त्वचा में जलन0-50 (अच्छा), 51-100 (मध्यम), 101-150 (संवेदनशील समूहों के लिए संवेदनशील), 151-200 (अस्वस्थ)
कार्बन मोनोऑक्साइड (CO)वाहन, हीटिंग उपकरण, बिजली जनरेटरश्वसन संबंधी समस्याएं (सिरदर्द, चक्कर आना), तंत्रिका तंत्र को नुकसान, हृदय रोग9-12 (अच्छा), 13-15 (संवेदनशील समूहों के लिए संवेदनशील), 16-30 (संवेदनशील समूहों के लिए अस्वस्थ), 31-40 (अस्वस्थ)
सीसा (Pb)वाहन, औद्योगिक प्रक्रियाएंतंत्रिका तंत्र को नुकसान, विकासात्मक देरी, गुर्दे को नुकसान0.15 µg/m³ से कम (अच्छा)
वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOCs)पेंट, सॉल्वैंट्स, गैसोलीन, औद्योगिक प्रक्रियाएंश्वसन संबंधी समस्याएं (आंखों में जलन, सांस की तकलीफ), कैंसर का खतराAQI के लिए विशिष्ट मान नहीं, व्यक्तिगत VOCs के लिए अलग-अलग मान हो सकते हैं
हैजार्डस एयर पॉल्यूटेंट (HAPs)औद्योगिक प्रक्रियाएं, बिजली संयंत्र, वाहन

वायु प्रदूषण के कारण (Causes of Air Pollution)

वायु प्रदूषण या तो प्राकृतिक हो सकता है या मानवजनित। वायु प्रदूषण के लिए उत्तरदायी प्राकृतिक कारण निम्नलिखित

  • प्रालामुखी विस्फोट- इनसे सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂), हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) आदि प्रदूषणकारी गैसें निकलती हैं।
  • जंगल की आग।
  • कच्छीय गैसें (जैसे CH4)
  • प्राकृतिक, कार्बनिक एवं अकार्बनिक पदार्थों के अपघटन उत्पाद ।
  • निलम्बित कणीय पदार्थ
  • बाह्य-स्थलीय पदार्थ ।
  • ब्रह्माण्डीय रज ।
  • पराग, बीजाणु आदि वाय व एलर्जीकारक ।

मानवजनित वायु प्रदूषक निम्नलिखित हैं

  • औद्योगिक उत्सर्ग ।
  • स्वचालित वाहन रेचन (Automobile Exhaust) :- वायु प्रदूषण के 60 प्रतिशत प्रदूषण के लिय यही विरेचक उत्तरदायी है। औसत 1000 गैलन पैट्रोल के जलने से लगभग 3200 पांउड CO, 200-400 पाउंड कार्बनिक-वाष्प, 20.75 पाउंड नाइट्रोजन के ऑक्साइड, 2 पाउंड कार्बनिक अम्ल, 2 पाउंड अमोनिया व 0.3 पाउंड ठोस कार्बन कण निकलते हैं।
  • घरेलू उत्सर्ग।
  • जीवाश्म ईंधनों के जलने से उत्पन्न पदार्थ ।
  • युद्ध में प्रयुक्त विस्फोटक सामग्री एवं अन्य रसायन आदि ।
  • कृषि में प्रयुक्त पदार्थ एवं कृषि क्रियाएँ।

वायु प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Air Pollution)

ये प्रदूषक मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं।

इनके कुछ प्रदूषक एवं उनके प्रभाव निम्नलिखित हैं:

  1. सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) – इससे वक्ष संकुचन, सिरदर्द, उल्टी होती हैं। इससे होने वाले विकार मृत्यु का भी कारण बन सकते हैं। यह नेत्र, फुफ्फुस व गले की श्लेष्मा झिल्ली को प्रभावित कर कई रोग पैदा करती है। SO₂, पौधों में रंध्रों द्वारा प्रवेश कर जल के साथ H₂SO₄ बनाता है। यह अम्ल पर्णहरित को विघटित करता है। लाइकेन व ब्रायोफाइट पादप SO₂ से शीघ्र प्रभावित होते हैं। यह गैस इन्हें मार देती है। लाइकेन को इस प्रदूषक का सूचक (Indicator) माना जाता है।
  2. धुआँ, कुहरे के साथ मिलकर धूम-कुहरा (Smog) बनाता है। इसमें SO2, O2, से अभिक्रिया कर SO4, बनाती है जो जल के साथ H2SO4 (गंधक का अम्ल ) बन जाता है। यह अम्ल इमारतों के पत्थरों व दीवारों को संक्षारित (Corrode) करता है।
  3. प्राकृतिक ईधनों के जलने से निकली NO2, गैस ऑक्सीकृत हो NO3 बनाती है। यह NO3 जल के साथ मिलकर हानिकारक HNO3 (नाइट्रिक अम्ल) बनाती है जो वर्षा के जल के साथ भूमि पर आ जाता है। यह वर्षा ‘अम्लीय वर्षा’ (Acid rain) होती है। अम्लीय वर्षा से मृदा की अम्लीयता बढ़ जाती है जो मृदा के उपजाऊपन को नष्ट करती है। यह इमारतों, रेल पटरियों, स्मारकों, मूर्तियों को संक्षारित कर क्षति पहुँचाती है।
  4. नाइट्रोजन के ऑक्साइड- ये पक्ष्मों (Cilia) की क्रिया को रोकते हैं। अतः कालिख तथा धूल कण फेफड़ों की गहराई में पहुँच जाते हैं जिससे श्वसन विकार होते हैं। नाइट्रोजन के ऑक्साइड आँखों में जलन, नाक व श्वास नली के रोग उत्पन्न करते हैं।
  5. हाईड्रोकार्बन के अपूर्ण दहन से बनने वाला 3-4 बैन्जिपायरिन, फुफ्फस कैन्सर का कारण है।
  6. हाइड्रोजन सल्फाइड- यह आँखों और गले में जलन उत्पन्न करती है तथा मितली आती है।
  7. हाइड्रोजन साइनायड- यह तंत्रिका कोशिकाओं को प्रभावित करती है। इससे गले का सूखना, अस्पष्ट दृष्टि तथा सरदर्द आदि प्रभाव होते हैं।
  8. अमोनिया- यह ऊपरी श्वसन मार्ग में सूजन उत्पन्न करता है।
  9. ईंधन के अपूर्ण दहन से CO (कार्बन मोनो-ऑक्साइड) बनती है। वायुमण्डलीय कुल प्रदूषकों का लगभग 50% CO है। श्वास के साथ यह विषाक्त गैस मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर रूधिर के हीमोग्लोबिन से संयोजित हो जाती है। इस संयोजन की दर हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन संयोजन की दर से 210 गुना अधिक है। परिणामतः मनुष्य के शरीर में 02 की कमी हो जाती है।
  10. धुएँ के अन्य कणीय अंश जैसे कि कालिख (Soot), टार, धूलकण आदि प्रकाश को कम कर देते है। ये भूमि पर धीरे-धीरे जमते है और पशु व मनुष्य के शरीर में, श्वसन द्वारा जाकर श्वासनली व फेंफड़ों के रोग पैदा करते हैं। ये धातु, पेन्ट की हुई सतहों, वस्त्रों, कागज व चमड़े को क्षति पहुँचाते हैं।

वायु-प्रदूषण का नियंत्रण (Control of Air Pollution)

संसाधनों के विवेकपूर्ण तथा सीमित उपयोग द्वारा वायु-प्रदूषण का नियंत्रण किया जा सकता है। इसके नियंत्रण की कुछ रणनीतियाँ निम्नलिखित हैं :

  1. अधिशोषण (Adsorption)- यह कुछ पदार्थों की सतह की विशेषताओं पर आधारित एक भौतिक प्रक्रिया है। इसमें तरल और गैस प्रवाह का सम्बन्ध, एक ठोस से कर देते हैं। सक्रियत चारकोल (Activated charcoal), सिलिका जैल, रेजिन आदि का उपयोग इस उद्देश्य से अधिशोषक के रूप में किया जाता है। इस प्रक्रिया में अधिशोषक का बार-बार उपयोग किया जाता है। अतः यह एक मितव्ययी प्रक्रिया है।
  2. अवशोषण (Absorption) यह भी एक भौतिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में गैस को एक तरल में घुलने दिया जाता है। अवशोषण के लिए जल सर्वाधिक उपयुक्त विलायक या माध्यम है।
  3. संघनन (Condensation) – गैसीय वाष्पों का नियंत्रण, संघनन प्रक्रिया द्वारा किया जा सकता है। परिवेशी (Ambient) ताप पर बहुत कम वाष्प दाब वाले हाइड्रोकार्बनों तथा अन्य कार्बनिक पदार्थों को हटाने के लिए यह सबसे उपयुक्त प्रक्रिया है। जल या वायु शीतलित संघनित्रों के उपयोग से वायु प्रदूषण का संतोषजनक नियंत्रण किया जा सकता है।
  4. रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा (By chemical reactions) रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा भी वायु प्रदूषण का नियंत्रण किया जा सकता है ।