ग्लोबल वार्मिंग (Global warming)

सामान्य परिस्थितियों में पृथ्वी का ताप इससे टकराने वाले सूर्य विकिरणों तथा अंतरिक्ष में वापस लौट जाने वाली किरणों द्वारा नियंत्रित होता है। जब वायुमण्डल में कार्बनडाइऑक्साइड की सांद्रता बढ़ जाती है तो इस गैस की मोटी परत किरणों को परावर्तित होने से रोकती है। यह मोटी ग्रीन हाउस की काँच की दीवार तथा कार की खिड़की के काँच की भांति होती है। यह दोनों ही गर्मी को बाहर विकृत होने से रोकती है। इसे ‘ग्रीन हाउस प्रभाव कहते हैं। यही क्रिया प्रकृति में भी होती है। यहां कार्बनडाइऑक्साइड, हाइड्रोजन, ओजोन, जलवाष्प, मीथेन, नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा क्लोरोलोरोकार्बन गैसें एक मोटी परत पृथ्वी के वातावरण में बना लेती हैं जो गलास हाउस के काँच की भांति ही कार्य करती है अर्थात् सूर्य उष्मा जो भीतर आती है पूरी ही पूरी वापस नहीं जाने पाती जिससे विश्व स्तर पर वातावरण की निचली परत में वायु का ताप बढ़ जाता है। बढ़ी हुई कार्बनडाइऑक्साइड की मात्रा में समुद्रों द्वारा अवशोषित किया जा सकता है परन्तु औद्योगीकरण तथा ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग से समुद्री अवशोषण क्षमता की तुलना में वायु मण्डल में अधिक कार्बनडाइऑक्साइड उत्सर्जित हो रही है। इस प्रकार वायुमण्डल में कार्बनडाऑक्साइड की सांद्रता निरंतर बढ़ रही है। कार्बनडाइऑक्साइड पृथ्वी के ताप में 50 प्रतिशत एवं क्लोरोलोरोकार्बन में 20 प्रतिशत तक की वृद्धि करती है।

कुछ अन्य गैसें जैसे सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड तथा क्लोरोलोरो कार्बन भी ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार 2050 में पृथ्वी का ताप 1 से 5 डिग्री तक बढ़ जाएगा। ताप बढ़ने से ध्रुवों पर अधिक प्रभाव पड़ेगा। ग्रीनलैंड, आइसलैंड, नार्वे, साइबेरिया एवं अलास्का इससे सर्वाधिक प्रभावित होंगे। ध्रुवीय बर्फ पिघल जाएगी। 5 डिग्री ताप वृद्धि से समुद्र स्तर में 5 मीटर की वृद्धि होगी जो सेनफ्रांसिस्को एवं शंघाई जैसे उच्च जनसंख्या वाले तटीय शहरों पर प्रभाव डालेगा।

वैश्विक तापवृद्धि से उत्पन्न प्रमुख समस्याएं

  • जैविक विविधता में तेजी से कमी आएगी तथा महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोतों का ह्रास होगा।
  • 1 डिग्री तापवृद्धि अक्षांश से 100 किमी परिवर्तन के बराबर होगा।
  • बढ़े हुए ताप से विश्व के अनेक भागों में तीव्र तूफान आएंगे। उन क्षेत्रों में भी तूफान आ सकते हैं जहां पहले कभी ऐसा नहीं होता था।
  • ताप बढ़ने से वर्षा एवं मानसून के स्वरूप में परिवर्तन होगा। कहीं पर सूखा होगा तथा कहीं अत्यधिक
  • पर्वत शिखरों एवं ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ेगा।
  • ताप वृद्धि से समुद्र गर्म होगा जिससे बांग्लादेश, भारत, मिश्र, इण्डोनेशिया आदि में बाढ़ आ सकती है।
  • वैश्विक तापवृद्धि से समुद्री पारिस्थिकी तंत्र अत्यधिक बिगड़ जाएगा।
  • तटीय शहरों की बाढ़ वहां संक्रामक रोग फैला सकती है।

वैश्विक ताप वृद्धि को नियंत्रित करने के उपाय

  1. ऊर्जा उत्पादन व उपयोग में सुधार करना।
  2. कार्बनिक ईंधन का प्रयोग कम करके उसके स्थान पर हाइड्रोजन ईंधन का प्रयोग किया जाए।

यह मुख्य रूप से मानवीय गतिविधियों के कारण होता है जो ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करते हैं, जैसे कि:

  • कार्बन डाइऑक्साइड: जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, और गैस) के जलने से।
  • मीथेन: कृषि, पशुपालन, और अपशिष्ट जल से।
  • नाइट्रस ऑक्साइड: कृषि और औद्योगिक प्रक्रियाओं से।

ग्रीनहाउस गैसें सूर्य की ऊष्मा को फँसाती हैं, जिससे पृथ्वी का तापमान बढ़ता है। ग्लोबल वार्मिंग के कुछ मुख्य प्रभावों में शामिल हैं:

  • बर्फ का पिघलना: ग्लेशियरों, ध्रुवीय बर्फ की टोपियों, और समुद्री बर्फ का पिघलना समुद्र के स्तर को बढ़ाता है।
  • चरम मौसम: तूफान, बाढ़, सूखा, और लू जैसी घटनाएं अधिक आम और तीव्र होती जा रही हैं।
  • जलवायु परिवर्तन: वनस्पतियों और जीवों के जीवन में परिवर्तन, साथ ही साथ कृषि उत्पादन और मानव स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता है।

ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों को कम करने के लिए, हमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए कार्रवाई करने की आवश्यकता है। कुछ महत्वपूर्ण उपायों में शामिल हैं:

  • नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों का उपयोग: जैसे कि सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, और जल ऊर्जा।
  • ऊर्जा दक्षता में सुधार: ऊर्जा की खपत को कम करने के लिए उपकरणों और प्रौद्योगिकियों का उपयोग करना।
  • वनों की कटाई को रोकना: वन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और जलवायु को स्थिर करने में मदद करते हैं।
  • जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना: अधिक लोग अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का कारण बनते हैं।